10, August 2025: लंबे समय से इलाहाबाद हाई कोर्ट के दो जज जस्टिस यशवंत वर्मा और जस्टिस शेखर यादव खबरों में बने हुए हैं और इसका कारण है जले हुए नोट उनके घर पाए जाना। ऐसा नहीं है कि पहली बार न्याय के देवता माने जाने वाले कोई जज इस तरह सवालों के घेरे में हैं। इतिहास में कई बार जजों पर तरह-तरह के आरोप लगाए जाते रहे हैं – यौन उत्पीड़न, ज़मीन पर कब्जा करना, पैसों का गलत लेन -देन और भ्रष्टाचार जैसे आरोप आदि। पर आपको जानकर हैरानी होगी कि हटाने की यह प्रक्रिया लोकसभा और राज्यसभा तक पहुंचने के बाद कई कारणों से टल गई और यह प्रक्रिया सफल नहीं हो पाई। कभी इस प्रक्रिया से पहले ही त्यागपत्र दे दिया गया तो कभी समर्थन पर्याप्त न होने के कारण यह प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पाई। आज के इस लेख में हम इस खबर को केंद्र में रखते हुए भारतीय संविधान में जजों को हटाए जाने के प्रावधान के बारे में बात करेंगे। आइए जानते हैं हमारा भारतीय संविधान जज को उनके पद से हटाए जाने के बारे में क्या कहता है :
भारतीय संविधान में न्यायाधीशों के महाभियोग का प्रावधान
संविधान में इस प्रक्रिया को इतना सरल नहीं बनाया गया, जितना सरल इनपर आरोप लगाना है। जी हां, यह प्रक्रिया बहुत ही लंबी है जिसमें कई बातें ध्यान देने योग्य हैं, आइए इनपर एक नज़र डालें :
सबसे पहले यह बता दें कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 124 और 216 के तहत न्यायाधीशों को कदाचार और अक्षमता के चलते हटाया जा सकता है।
सर्वप्रथम जज को पद से हटाने की प्रक्रिया आरंभ करने के लिए प्रस्ताव जो लाया गया है उसपर लोकसभा के 100 सांसदों और राज्यसभा के 50 सांसदों का समर्थन होना चाहिए, जिसे अध्यक्ष/सभापति को भेजा जाता है।
यह प्रस्ताव भेजे जाने के बाद अब यह अध्यक्ष/सभापति पर निर्भर करता है कि वे इस प्रस्ताव को स्वीकार करें या नहीं। स्वीकार्य होने पर तीन सदस्यों की समिति बनाकर इस पूरे मामले की तह तक जांच पड़ताल की जाती है और फिर रिपोर्ट सौंपी जाती है। कोई ठोस सबूत न होने पर या आरोप मनगढ़ंत होने पर यह बात वहीं पर समाप्त कर दी जाती है।
यदि इसमें न्यायाधीश दोषी पाया गया है तो संसद के दोनों सदनों में इसपर विस्तार से चर्चा होने के बाद मतदान की प्रक्रिया शुरू होती है। बता दें कि इसके लिए सदन में 2/3 बहुमत चाहिए और ऐसा होने पर ही हटाने का यह प्रस्ताव पारित माना जाता है।
अंत में यह प्रस्ताव राष्ट्रपति के समक्ष भेजा जाता है और इस तरह हटाने की यह प्रक्रिया पूरी होती है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों को हटाए जाने की प्रक्रिया
संविधान में कदाचार और अक्षमता होने पर जजों को हटाया जा सकता है जबकि सुप्रीम कोर्ट के CJI न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत किसी गलत काम में लिप्त संबंधित कोर्ट के न्यायाधीश को हटाने के लिए समिति गठित कर सकते हैं और या फिर अनुशासनात्मक कार्यवाई का प्रस्ताव दे सकते हैं।