ग्रीनलैंड का विवाद इन दिनों बढ़ता ही जा रहा है, क्योंकि अमेरिका ग्रीनलैंड को सुरक्षा के लिहाज़ से अपने हिस्से में चाहता है। दुनिया देख रही है कि ट्रंप किस तरह आक्रामक बनकर अमेरिका की विस्तारवादी नीति को आगे बढ़ा रहे हैं। अमेरिका हमेशा से खुद को एक महाशक्ति के तौर पर सबसे आगे रखना चाहता है और इसी कारणवश डोनाल्ड ट्रंप कमज़ोर देशों पर हावी हो गए हैं। इनमें से एक है ग्रीनलैंड जिसपर अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच विवाद है। पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसी देश को अपने हिस्से में रखने की मांग एक सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश यानी अमेरिका इतनी आसानी से कैसे कर सकता है? क्या उसकी कोई संप्रभुता या अखंडता नहीं? तो इसके पीछे ग्रीनलैंड का वो इतिहास है जिससे बहुत कम लोग वाकिफ हैं।
ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति
ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति की बात करें तो यह आर्कटिक महासागर और उत्तरी अटलांटिक महासागर के बीच स्थित है। अगर आप मैप में देखें तो इसे कनाडा के उत्तर-पूर्व और आइसलैंड के उत्तर-पश्चिम में, खासतौर से आर्कटिक सर्कल के ऊपर फैला हुआ पा सकते हैं। ग्रीनलैंड का कुल क्षेत्रफल करीब 21.6 लाख वर्ग किलोमीटर है, सबसे रोचक बात यह कि इस 21.6 लाख वर्ग किलोमीटर का करीब 81% हिस्सा बर्फ की मोटी चादर से ढका है। इस तरह केवल 19% हिस्सा ही रहने योग्य आबादी वाला है। ग्रीनलैंड में गनब्योर्न फ्येल्ड नामक माउंटेन सबसे ऊंचा है जिसकी ऊंचाई 3,694 मीटर है।
ग्रीनलैंड का प्राचीन इतिहास
आज से करीब 4000-5000 साल पहले कनाडा के रास्ते उत्तरी महाद्वीप से यहां लोग बसने आए थे। ग्रीनलैंड के मूल निवासी इनुइट (Inuit) और थुले (Thule) हैं जो आर्कटिक क्षेत्र में रहते थे। इनकी संस्कृति खासियत हुआ करती थी शिकार, मछली पकड़ना और समुद्री जीवों पर निर्भर रहना। वहीं, ग्रीनलैंड का वातावरण अत्यधिक ठंडा होने के चलते इन लोगों ने तकनीक, पोशाक, नावें और सामुदायिक ढांचे विकसित किए। हालांकि अब यहां इन संस्कृतियों के साथ डेनिश जीवनशैली का प्रभाव भी देखने को मिलता है।
ग्रीनलैंड की खोज
ग्रीनलैंड में मानव उपस्थिति की बात करें तो यह लगभग 4,500 साल पुरानी मानी गई है। इस द्वीप पर पहले पेलियो-इनुइट संस्कृतियां आईं, उसके बाद 1300 ईस्वी के आसपास थुले इनुइट समुदाय यहां आकर बसे। फिर 982 ईस्वी में एक निर्वासन की घटना ने ग्रीनलैंड को खोजा। बता दें कि एरिक द रेड 10वीं शताब्दी के नॉर्स समुदाय से जुड़ा एक व्यक्ति था जिसे हत्यारे की संज्ञा मिली हुई थी। ऐसा इसलिए क्योंकि इस एरिक पर हिंसक झगड़ों और हत्या जैसे गंभीर आरोप लगे, और इसी के चलते उसे नॉर्वे/आइसलैंड के क्षेत्रों से निर्वासित कर दिया गया। यह वो समय था जब नॉर्स समाज में कानून और बदले की परंपराएं बेहद कठोर हुआ करती थीं। किसी गंभीर कृत्य में किसी व्यक्ति को निर्वासित किया जाना उस समय में एक आम बात हुआ करती थी।
इस तरह एरिक निर्वासन की वजह से दूसरे क्षेत्र में बसने को मजबूर कर दिया गया। एरिक ने आइसलैंड से पश्चिम की ओर समुद्री यात्रा करनी शुरू की। उससे पहले भी कुछ नाविकों द्वारा पश्चिम में भूमि दिखने की खबरें मिली थीं, लेकिन एरिक ने पूरी योजना के साथ उस दिशा में आगे बढ़ना शुरू किया और ग्रीनलैंड के तटों की खोज की।
ग्रीनलैंड नाम की रोचक कहानी
एरिक लोगों को वहां बसने के लिए प्रेरित करना चाहता था इसलिए उसने इस द्वीप को ग्रीनलैंड नाम दिया। दूसरे शब्दों में कहें तो एरिक की यह किसी जगह का प्रचार करने की रणनीति थी ताकि लोग ग्रीनलैंड नाम सुनकर यहां ज्यादा से ज्यादा आकर्षित हों। इस तरह ग्रीनलैंड को यूरोपीय लोगों ने जाना और यहां धीरे – धीरे बसना शुरू किया। पर ग्रीनलैंड के बसने की यह कहानी केवल यूरोप केन्द्रित है क्योंकि इसमें आंशिक सच्चाई है। नॉर्स आबादी सदियों तक ग्रीनलैंड में रही लेकिन 1500 ईस्वी के आसपास उनकी आबादी लगभग गायब हो गई। हालांकि इसके कारणों का अभी तक पता नहीं चल पाया है।
ग्रीनलैंड कैसे बना डेनमार्क का हिस्सा?
नॉर्स आबादी के गायब होने के लगभग 200 साल बाद 1721 में नॉर्वे के एक मिशनरी हैंस एगेडे एक नाव से ग्रीनलैंड पहुंचते हैं, यहीं से डेनमार्क की एंट्री ग्रीनलैंड में होती है। बता दें कि एगेडे की यात्रा के लिए डेनमार्क और नार्वे की राजशाही से मंज़ूरी ली गई थी। यहां जानने वाली बात यह है कि उस समय डेनमार्क और नॉर्वे एक ही राजशाही के अधीन हुआ करते थे। एगेडे का वहां पहुंचने के पीछे उद्देश्य था वहां के लोगों को ईसाई धर्म से जोड़ना। जब वे वहां पहुंचे तो ग्रीनलैंड में केवल इनुइट लोगों ही मिले। एगेडे ने अपनी कोशिशों से ईसाई धर्म में बदलने का निर्णय लिया। इस प्रकार, इस आर्कटिक क्षेत्र में औपनिवेशिक काल की शुरुआत होती है। जब साल 1814 में डेनमार्क और नार्वे की राजशाही अलग हुई तो ग्रीनलैंड डेनमार्क के हिस्से आया। फिर साल 1916 में अमेरिका ने डेनमार्क की ग्रीनलैंड पर संप्रभुता को मान्यता दी थी। इस मान्यता के बदले में अमेरिका को डेनिश वेस्टइंडीज़ की खरीदने का सुनहरा मौका मिला था।
दूसरे विश्वयुद्ध के बाद ग्रीनलैंड में उपनिवेशवाद खत्म करने को लेकर डेनमार्क पर दबाव बनाया जाने लगा। संयुक्त राष्ट्र संघ के दबाव के कारण साल 1953 में ग्रीनलैंड नामक इस कॉलोनी को डेनमार्क में मिला दिया गया। राजनीतिक शक्ति के लिए ग्रीनलैंड को डेनमार्क की संसद में दो सीटें दी गईं। फिर साल 1979 में ग्रीनलैंड को होमरूल दिया गया, यानी अब वहां संसद का गठन किया जा सकता था। उस दौरान ग्रीनलैंड की आज़ादी का भी ब्लूप्रिंट तैयार किया गया। इस मांग को स्वीकार करते हुए साल 2009 में एक कानून पारित किया गया। इस कानून से यह पक्का हो गया कि डेनमार्क से आज़ादी लेने का फैसला ग्रीनलैंड के लोग ही करेंगे।
डोनाल्ड ट्रंप का ग्रीनलैंड पर दावा
डोनाल्ड ट्रंप ने साल 2025 के जनवरी महीने में राष्ट्रपति बनते ग्रीनलैंड को पाने की अपनी इच्छा जताई थी। हालांकि, उन्होंने इतने आक्रमक तरीके से न कहते हुए इसे अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से और सुरक्षा के लिहाज़ से महत्वपूर्ण बताया था। अब हाल के घटनाक्रम में अमेरिका ने ग्रीनलैंड को लेकर सैन्य और रणनीतिक गतिविधियां तेज करने के संकेत दिए हैं क्योंकि ट्रंप का दावा है कि वहां रूस और चीन की गतिविधियां बढ़ती जा रही हैं। यूरोप डोनाल्ड ट्रंप के इस रवैए से खासा नाराज़ है, क्योंकि ग्रीनलैंड अभी भी डेनमार्क के अधीन होते हुए भी स्वायत्त क्षेत्र है। ऐसे में यह सवाल केवल ग्रीनलैंड का नहीं बल्कि पूरे यूरोप की संप्रभुता पर खड़ा हो गया है।
ग्रीनलैंड के लिए एक साथ आया यूरोप
यूरोपीय देश जैसे ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस ने साफ शब्दों में कहा है कि ग्रीनलैंड पर कोई भी एकतरफा कदम स्वीकार नहीं किया जाएगा। यहां खास बात यह है कि ये देश नाटो के सदस्य भी हैं और इसके बावजूद उन्होंने अमेरिका को चेतावनी भरे शब्दों में यह संदेश दिया है।
डोनाल्ड ट्रंप का यूरोपीय देशों पर टैरिफ का ऐलान
ट्रंप ने इसे देखते हुए अब एलान कर दिया है कि डेनमार्क, नॉर्वे, स्वीडन, फ़्रांस, जर्मनी, ब्रिटेन, नीदरलैंड्स और फ़िनलैंड पर एक फ़रवरी से 10 प्रतिशत टैरिफ़ लागू किया जाएगा और इसकी जानकारी ट्रंप में अपने ट्रुथ सोशल पोस्ट के जरिए दी। इस पोस्ट में कहा गया कि यह टैरिफ बाद में बढ़कर 25 प्रतिशत तक हो सकता है और इसे तब तक जारी रखा जाएगा जबतक ग्रीनलैंड का विवाद किसी समझौते पर नहीं पहुंचा जाता। इसे देखते हुए 17 जनवरी को ग्रीनलैंड और डेनमार्क में हज़ारों लोग सड़कों पर उतर आए और उन्होंने अमेरिका के प्रस्तावित कब्ज़े के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाना शुरू कर दिया।
आखिर ग्रीनलैंड पर क्यों कब्जा करना चाहता है अमेरिका?
वैसे तो अमेरिका का कहना है कि वह ग्रीनलैंड को अपनी सुरक्षा के लिए चाहता है लेकिन इस बात का दूसरा पहलू भी है। ठीक वैसे ही जैसे वेनेज़ुएला के मामले में दूसरा पहलू था जिसपर अमेरिका ने कहा था कि यह ड्रग के खिलाफ अभियान है लेकिन असल में अमेरिका की नज़र वेनेजुएला के तेल पर और अपने डॉलर के बचाव पर थी।
ग्रीनलैंड का अमेरिका के लिए रणनीतिक महत्व
अब बात करते हैं ग्रीनलैंड की तो नॉर्थ अमेरिका और आर्कटिक के बीच स्थित होने की वजह से ग्रीनलैंड की रणनीतिक भूमिका काफी ज़्यादा है। दरअसल, ग्रीनलैंड ऐसी लोकेशन पर है जहां से निगरानी बेहतर की जा सकती है। इस तरह यह डिफेंस के मामले में काफी अहम हो जाता है। अगर कोई देश मिसाइल से हमला करने वाला है, तो यहां पर फिट सिस्टम बहुत जल्दी इस बात का पता लगा सकते हैं और एलर्ट के तौर पर किसी बड़े खतरे की तैयारी पहले से की जा सकती है। आर्कटिक क्षेत्र में जिन भी देशों के जहाजों का आना जाना होगा है, उन पर नजर रखने में इसकी भूमिका होगी। इस निगरानी से यह समझने में मदद मिलती है कि किस इलाके में कौन-कौन सी गतिविधियां हो रही हैं। फिर सुरक्षा के लिहाज से अपनी स्थिति बेहतर की जा सकती है।
ग्रीनलैंड के संसाधन
जैसे कि पहले ज़िक्र किया जा चुका है कि ग्रीनलैंड में आधी से ज़्यादा बर्फ है, और हाल ही में बर्फ के पिघलने से यहां दुर्लभ पृथ्वी खनिज (rare earth minerals), यूरेनियम और लोहा की मात्रा बढ़ती जा रही है। ऐसी संभावना है कि यहां तेल और गैस के बड़े भंडार भी हो सकते हैं। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप की इसपर नज़र होना लाज़मी है।
