15 august 2025: रफ़ीक़ शादानी अवधी भाषा के एक ऐसे कवि हैं जिनके अंदाज़ को पसंद किए बगैर खुद प्रधानमंत्री भी नहीं रह सके । रफ़ीक़ शादानी के जन्म कि तारीख तो नहीं मिलती लेकिन 1934 मार्च के महीने में जन्मे रफ़ीक़ जब 9 फ़रवरी 2010 में दुनिया को अलविदा कह गए तो यक़ीनन अवधी भाषा ने अपना एक लायक कवि खो दिया। रफ़ीक़ शादानी कि कविताएं राजनीति के असली चेहरे को पेश करती हैं वो अपनी कविताओं के ज़रिए देश के आम इंसान की हालत को बयान करते हैं। फैज़ाबाद के रफ़ीक़ बर्मा में पैदा हुए उनके पिता जी का इत्र और तंबाकू का व्यापार था। रफ़ीक़ शादानी जब स्टेज से अपनी कविता पढ़ते हैं तो उनके सुनने वालों कि तालियों की गड़गड़ाहट ही बता देती है कि वो कितने सारे लोगों के जज़्बात को ज़ाहिर कर रहे हैं । तो पढ़िए रफ़ीक़ शादानी क्या फरमाते हैं –
पाखंडी रहएं छाँव म घामें म जरी हम,
जलपान करें नेता भुगतान करी हम ,
भारत के किसानन के दुर्भाग तनी देखौ,
गेंहू का धरै दिल्ली भूँसा का धरी हम ।
इस तरह रफ़ीक़ शादानी बड़ी खूबसूरती से देश के नेताओं कि पोल खोलते हुए और किसानों के हालात बयान करते नज़र आते हैं । तो चलिए नज़र डालते हैं उनकी 3 लाजवाब कविताओं पर।
- जियो बहादुर खद्दरधारी!!
ई महंगाई ई बेकारी , नफरत कै फैली बीमारी
दुखी रहै जनता बेचारी, बिकी जात बा लोटा थारी,
जियो बहादुर खद्दरधारी!!
मनमानी हड़ताल करत हौ, देसवा का कंगाल करत हौ ,
खुदका मालामाल करत हौ , तौहरेन दम पर चोर बजारी ,
जियो बहादुर खद्दरधारी!!
धूमिल भए गांधी के खादी , पहिरे लागे अवसरवादी ,
या तो पहिरे बड़े प्रचारी , देस का लूटो बारी बारी ,
जियो बहादुर खद्दरधारी !!
तन कै गोरा मन कै गंदा , मस्जिद – मंदिर नाम पै चन्दा ,
सबसे बढ़िया तोहरा धंधा , न तो नमाजी न तो पुजारी ,
जियो बहादुर खद्दरधारी!!
सूखा या सैलाब जो आवे , तोहरा बेटवा खुसी मनावे ,
घरवाली आँगन म गांवे मंगल भवन अमंगल हारी ,
जियो बहादुर खद्दरधारी !!
झण्डै झण्डा रंग बिरंगा , नगर नगर म कर्फ्यू दंगा ,
खुसहाली म पड़ा अड़ंगा , हम भूख तो खाऔ सुहारी,
जियो बहादुर खद्दरधारी !!
बरखा म विद्यालय ढईगा , वही के नीचे टीचर रहिगा,
नहर के खुलते दुई पुल बहिगा , तौहरेन पूत के ठेकेदारी ,
जियो बहादुर खद्दरधारी!!
2) नेता लोगे घूमै लागे
अपनी अपनी जजमानी मा
उठौ कहिलऊ, छोरौ खिचरी ,
मारौ हाथ बिरयानी मा
इहि वार्ता होति रहि कल ,
रामदास राजमानी मा
दूध कसी मटकी धरेउ न भईया ,
बिल्ली के निगरानी मा ।
3) तू चाहत हौ भाईचारा उल्लू हौ ,
देखै लाग्यो दिनै म तारा उल्लू हौ ,
समय के समझो यार इसारा उल्लू हौ ,
तुमहूँ मारो हाथ करारा उल्लू हौ ,
कइसे इन्टर पास केहो बस जान गएन ,
कहा इक्यासी लिखो अट्ठारा उल्लू हौ ,
कट्टरपंथी जान से हम तो भाग लिहेन ,
तुमहूं होइ गयो नौ दुई ग्यारह उल्लू हौ ,
दहेज म मारुति पायो खुसी भई ,
दुल्हिन पायो माहे खटारा उल्लू हौ,
डिग्री लाइके बेटा घर घर भटको न ,
हवा भरो बेचौ गुब्बारा उल्लू हौ ,