ग्रीन पटाखे कर सकते हैं दिल्ली में दोगुना प्रदूषण! ये हैं 3 वजहें

दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के चलते सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों को पूरी तरह से बैन कर दिया था। लेकिन हाल ही में, सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में थोड़ी राहत देते हुए ग्रीन क्रैकर्स चलाने की अनुमति दे दी है। इसपर कुछ लोगों में खुशी की लहर है तो कुछ दिल्ली के पर्यावरण के लिए अधिक चिंतित हैं। आज के इस लेख में हम बात करेंगे कि ग्रीन क्रैकर्स या ईको फ्रेंडली पटाखे क्या वाकई में इको फ्रेंडली हैं या इनसे भी प्रदूषण होता है।

ग्रीन क्रैकर्स क्या हैं?

ग्रीन क्रैकर्स जिनके नाम से ही पता चलता है पर्यावरण के लिए फ्रेंडली पटाखे। इन्हें CSIR-NEERI यानी नेशनल एनवायरमेंटल इंजीनियरिंग रिसर्च इंस्टीट्यूट ने बनाया है। इनमें एलुमिनियम, पोटेशियम नाइट्रेट और सल्फर जैसे केमिकल कम मात्रा में होते हैं जिससे पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचता है।

क्या ग्रीन क्रैकर्स प्रदूषण नहीं करते?

ये पटाखे सामान्य पटाखों की तुलना में करीब 40% कम प्रदूषण फैलाते हैं पर ये प्रदूषण रहित नहीं है। दूसरे शब्दों में कहें तो ये पटाखे इको फ्रेंडली होने के बावजूद पर्यावरण के लिए पूरी तरह से फ्रेंडली नहीं हैं।

साधारण पटाखे पर्यावरण के लिए नुकसानदेह इसलिए हैं क्योंकि इनमें बेरियम नाइट्रेट, सल्फर, एल्युमीनियम, पोटेशियम क्लोरेट, और सीसे जैसे केमिकल होते हैं। जब इन्हें जलाया जाता है तो इनसे निकलने वाला सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOₓ), और PM2.5 व PM10 कण हवा को भारी मात्रा में प्रदूषित करता है।

इसके विपरीत ग्रीन क्रैकर्स में बेरियम और बाकी केमिकल तत्व नहीं होते जिससे ये साधारण पटाखों की तुलना में 40% कम प्रदूषण करते हैं। इस तरह जवाब यही मिलता है कि भले ही इन पटाखों का इको फ्रेंडली हो पर ये पूरी तरह से प्रदूषण से रहित नहीं।

दिल्ली में क्यों ग्रीन क्रैकर्स से बढ़ सकता है प्रदूषण?

दिल्ली में इको फ्रेंडली पटाखे भी एक बड़ी समस्या बन सकते हैं जिनके कारण यहां बताए जा रहे हैं :

अधिक प्रदूषण की संभावना

अब जब इनका नाम ग्रीन क्रैकर्स है तो यह लोगों के मन में यह धारणा बना सकता है कि इनसे प्रदूषण नहीं होता, क्योंकि हर किसी को ग्रीन क्रैकर्स की पूरी जानकारी नहीं। ऐसे में अगर ये 40% कम प्रदूषण भी कर रहे हैं तो इन्हें ज्यादा जलाए जाने की वजह से यह तरीका भी दिल्ली की हवा को प्रदूषित करेगा, बल्कि संभावना तो ज्यादा प्रदूषण की है।

सामाजिक और सांस्कृतिक दबाव

पटाखे जलाना दिवाली से जोड़कर देखा जाता है, इस वजह से सामाजिक और सांस्कृतिक दबाव लोगों को पर्यावरण के प्रति कम चिंतित बनाता है और त्योहार के प्रति अधिक। इससे यही अनुमान लगाया जा सकता है कि ग्रीन क्रैकर्स भी प्रदूषण की बड़ी समस्या बन सकते है।

नियमों को सख्ती से लागू करना मुश्किल

जब सुप्रीम कोर्ट ने पटाखों को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया था, उसके बावजूद पटाखे जलाए जा रहे थे। इससे पता चलता है कि लोगों ने न्यायालय के निर्णय को भी सख्ती से नहीं माना। फिर ये दो दिन की सीमा का पालन भी सख्ती से किया जाएगा, यह भी बड़ा सवाल है।

 

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