एक महिला होने के नाते ऐसा मैंने भी कई बार सोचा है कि मेरे लिए शादी प्राथमिकताओं की सूची में सबसे आखिरी में क्यों है! वैसे तो इसका जवाब व्यक्तिगत स्तर पर होगा पर अगर हम इसके सामाजिक कारणों पर नज़र डालें, खासकर कि भारत में स्थिति को ध्यान में रखते हुए तो ऐसे बहुत से कारण हो सकते हैं।
क्यों महिलाएं शादी करने में रुचि नहीं ले रहीं? (Why Women Are Not Interested In Getting Married?)
एक महिला की व्यक्तिगत राय को एक तरफ रखते हुए मैंने यहां एक संगठित राय के आधार पर कुछ बातें अनुभव की हैं, जिनका ज़िक्र मैं यहां करने जा रही हूं :
करियर सबसे बड़ी प्राथमिकता
आजकल कंधे से कंधा मिलाकर आग बढ़ती महिलाएं पीछे नहीं छूटना चाहती हैं। उन्हें भी अब ठीक वैसा ही चस्का है पैसा और पद का जिस तरह एक पुरुष को। सोचने वाली बात भी है क्यों अब औरत पीछे रहे सिर्फ इसलिए कि जेंडर अलग है? दूसरा करियर उन्हें एक सुरक्षा का एहसास दिलाता है, ताकि कोई यह न कहने पाए कि लड़कियों के अपने घर नहीं होते।
बुरी खबरें या अनुभव इसके लिए जिम्मेदार
महिलाओं के साथ शादी के बाद बढ़ता शोषण या रिलेशनशिप में मिला धोखा इसका सबसे बड़ा और नकारात्मक कारण हो सकता है। दहेज के लिए जला दी गईं महिलाएं, मैरिटल रेप या घरेलू हिंसा का शिकार होती महिलाएं ही उनके लिए समाज रूपी आईना बन जाती हैं जो उन्हें डराती हैं।
दोहरे बोझ की वजह से
हां, यह दोहरा बोझ भी एक बड़ी वजह है। शादी के बाद घर और बच्चों के साथ नौकरी में संतुलन बिठाना एक महिला के लिए बड़ा मुश्किल हो जाता है। फिर गर्भावस्था के बाद तो भारत जैसे देशों में उन्हें अपने करियर से ही हाथ धोना पड़ता है।
शादी पुरुष प्रधान समाज का हिस्सा है
पुरुष कहने को धन-दौलत और ज़मीन के मामले में आत्मनिर्भर हो, पर वह अपनी घरेलू और भावनात्मक जिम्मेदारियों के लिए महिला पर निर्भर रहता है। यह निर्भरता ही है जो शादी को पुरुष प्रधान समाज का हिस्सा बनाती है। फिर यह सदियों की मानसिकता कई बार घर में क्लेश का कारण बनती है।
क्योंकि लड़कियों की शादी होनी चाहिए
लड़कियां हैं इन्हें तो दूसरे घर जाना है। कभी-कभी लगता है ये कोई यूनिवर्सल सच है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। पर मेरा सवाल है कि क्यों? शादी की इस प्रथा में त्याग करना स्त्री के लिए ही क्यों लिखा गया है?
आज़ादी ज़्यादा पसंद
भारतीय समाज में एक औरत बचपन से कई प्रतिबंधों में रहती है। इसी वजह से कुछ में यह एक विद्रोह की भावना भी है और इस विद्रोह की मंज़िल है आज़ादी। आज़ादी उन सभी सामाजिक बेड़ियों से ताकि वे खुलकर जी पाएं।
बढ़ते अफेयर की वजह से कम भरोसा
एकस्ट्रा मैरिटल अफेयर के किस्से इतने आम हैं कि एक से ज्यादा पत्नी रखने के जिस रिवाज़ को खत्म किया गया था, वह मज़ाक सा लगता है। अपने आसपास उन शादीशुदा पुरुष मित्रों पर एक नज़र आप डालें जिनकी चाल, ढाल और बातें सिंगल जैसी लगती हैं, जवाब वहीं छिपा है।
रूढ़िवादी परंपराएं
कन्यादान के बाद माता-पिता का गंगा नहाना मुझे बहुत खलता है, कोई लड़की क्यों वो सब सहती जाती है जो उसे नहीं सहना चाहिए? क्योंकि उसका दान किया जा चुका है, अब तो चिता भी ससुराल से ही उठेगी! इसके अलावा 7 फेरों और उसके वादों में भी मुझे जेंडर के आधार पर एक संतुलन दिखाई देता है।
जरूरत से ज्यादा उम्मीदें
लड़की ने घर छोड़ा है, अपना परिवाद छोड़ा है, दूसरे घर की उम्मीद बनने के लिए। इतनी उम्मीदें जिसमें कई बार दम घुटने लगता है क्योंकि ये एक तरफा हो जाती हैं। उससे यह आशा की जाती है कि अब यह आ गई है तो सब यही संभालेगी, पर कैसे? एक नए घर में इतनी सारी जिम्मेदारियां वो भी नए लोगों के बीच?
बच्चे नहीं चाहिए
पढ़ने लिखने के बाद कई महिलाएं यह सोच बना लेती हैं कि उन्हें बच्चे नहीं चाहिए, इसके विकल्प के तौर पर वो अनाथालय से एक बच्चा एडॉप्ट करना सही समझती हैं। उनके लिए ज़िंदगी का दूसरा हिस्सा शादी का एक कॉन्ट्रैक्ट होने से ज्यादा समाज में रहकर कुछ मूल्यवान करना है।
1 Comment
Right 👍