फिल्म हेरा फेरी में परेश रावल के किरदार बाबूराव इन दिनों सुर्खियों में हैं। वैसे तो ज्यादातर मीम में बाबूराव हंसी ठिठोली करते नज़र आते हैं पर इस बार मामला थोड़ा लीगल है। हां! ये किरदार कानूनी दांव पेंच में फंसकर अपना हक़ मांग रहा है। पहले हम आपको इस पूरे मामले की जानकारी देंगे और उसके बाद रचनात्मकता से जुड़े भारत में कानून और अधिकारों की भी बात करेंगे।
द ग्रेट कपिल शर्मा कॉमेडी शो में बाबूराव के किरदार पर बवाल
कपिल शर्मा के कॉमेडी शो में क्रिएटिविटी के ज़रिए दर्शकों का मनोरंजन किया जाता रहा है, पर इस बार का मनोरंजन उनपर ही भारी पड़ गया है। दरअसल प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला ने इस कॉमेडी शो और नेटफ्लिक्स के खिलाफ लीगल नोटिस जारी किया है।
हुआ यूं कि अभी हाल ही में ‘द ग्रेट इंडियन कपिल शो’ के आने वाले एपिसोड का प्रोमो रिलीज हुआ था जिसमें कीकू शारदा “हेरा-फेरी” के किरदार बाबूराव का रोल निभाते नज़र आ रहे थे। इसी को लेकर फिरोज नाडियाडवाला ने कॉपीराइट एक्ट, 1957 की धारा 51 के तहत कॉपीराइट उल्लंघन और ट्रेडमार्क एक्ट की धारा 29 के तहत ट्रेडमार्क उल्लंघन का आरोप लगाते हुए 25 करोड़ के हर्जाने की मांग की है। इसके अलावा, 24 घंटे के अंदर माफी की मांग के साथ भविष्य में बगैर अनुमति ऐसा न करने की भी लिखित गारंटी मांगी गई है। बता दें कि यह दावा बौद्धिक संपदा अधिकार के अंतर्गत किया गया है।
प्रोड्यूसर फिरोज नाडियाडवाला का बयान
प्रोड्यूसर ने रचनात्मकता को केंद्र में रखते हुए कहा कि बाबूराव सिर्फ एक किरदार नहीं, बल्कि फिल्म हेरा फेरी की आत्मा है। इस कैरेक्टर की विरासत हमारे पसीने, लंबे लक्ष्य, रचनात्मकता से बनी है। एक्टर परेश रावल ने इस किरदार को दिल से तराशा है। इस तरह किसी को भी यह अधिकार नहीं कि वह इस किरदार का उपयोग अपने बिज़नेस और फायदे के लिए करे।
बौद्धिक संपदा अधिकार
इसे आसान भाषा में समझें तो यह वह अधिकार है जिसमें एक रचनाकार को अपनी रचना पर एक निश्चित अवधि के लिए एकाधिकार प्राप्त होता है, जिसकी सीमा समय के साथ बढ़ाई जाती है। इसमें केवल रचना ही नहीं बल्कि आविष्कार, साहित्यिक, वैज्ञानिक, कलात्मक, डिज़ाइन और कई अन्य चीज़ें भी शामिल हैं।
भारत में बौद्धिक संपदा को लेकर कानून
पेटेंट अधिनियम 1970, कॉपीराइट अधिनियम 1957, ट्रेडमार्क अधिनियम 1999, डिज़ाइन अधिनियम 2000, सांकेतिक/भौगोलिक संकेत (उत्पादों का पंजीकरण और सुरक्षा) अधिनियम, 1999। इनमें से रचनात्मकता को लेकर कॉपीराइट अधिनियम 1957 और ट्रेडमार्क अधिनियम 1999 खास है। आइए इन दोनों कानूनों पर बात करते हैं :
कॉपीराइट अधिनियम 1957
इस कानून के दायरे में किताबें, कविताएं, निबंध, उपन्यास, नाटक, कहानी, लघुकथा, थिएटर की पटकथा, लेख, शोधपत्र आते हैं। रचनाकार के पास यह अधिकार है कि वह अपने जीवनकाल तक इस अधिकार का उपयोग कर सकता है। रचनाकार की मृत्यु के पश्चात उसके उत्तराधिकारी अगले 60 तक उसके कॉपीराइट अधिकार का फायदा ले सकते हैं।
ट्रेडमार्क अधिनियम 1999
पूरी तरह से तो नहीं पर कुछ खास परिस्थितियों में यह अधिनियम किरदार पर लग सकता है, जैसे – अगर किरदार का इस्तेमाल किसी ब्रांड, उत्पाद या सेवा के लिए हो, किरदार की खास पहचान हो। ध्यान देने वाली बात यह कि किसी उपन्यास या कहानी के सामान्य से किरदार पर यह शर्तें लागू नहीं होती।
मेरा सवाल : सोशल मीडिया पर बाबूराव के मीम
जहां तक कॉपीराइट कानूनों की मुझे थोड़ी बहुत समझ है इस हिसाब से यह लाभ के उद्देश्य से किया जाना भी हर्जाने की श्रेणी में आता है पर सोशल मीडिया पर बाबूराव से जुड़े अनेकों मीम के जरिए भी लोग कमा रहे हैं, वह भी एक लिखित कॉमेडी है इसपर अभी तक आपत्ति न जताना अजीब नहीं है? है चीज़ों को फेयर यूज़ की श्रेणी में रखा गया है पर क्यों? इसके अलावा मेरा दूसरा सवाल यह रचनाकार के लिए कि क्या उनका उद्देश्य लीगल नोटिस भेजकर सीख देना नहीं था बल्कि यहां भी लाभ कमाना केंद्र में था?
