भाषा हमारे संवाद का आधार है । बगैर भाषा के आप अपनी बात को किसी दूसरे तक पँहुचाने में असमर्थ होते हैं । अगर आप ठीक तरह से अपनी बात रखने में माहिर हैं तो यक़ीनन आप बहुत सी मुश्किलों को हल कर सकते हैं । फिर जहां आपका पहला काम लोगों से संवाद कर उनके विश्वास को जीतने का हो तब तो आपकी भाषा का स्तर बहुत बेहतर होना चाहिए , मगर आज जो हालात हैं वो इससे बिल्कुल हटके हैं । राजनीति में भाषा का स्तर इस क़दर गिरा है कि आप अपने परिवार में साथ बैठकर कर इन नेताओं के भाषण नहीं सुन सकते हैं । जहां बहुत से नेता अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए शायरी और व्यंग्य का सहारा लेते थे वहीं अब के नेता गाली का सहारा लेते हैं ।
प्रधानमंत्री क्यों हुए भावुक ?
हाल ही में प्रधानमंत्री ने भावुक होते हुए कहा है कि ‘माँ के आशीर्वाद से ही मैं देश की सेवा कर रहा हूं , हर माँ चाहती है कि उसका बेटा उसकी सेवा करे , लेकिन मेरी माँ ने खुद के लिए नहीं आप जैसी करोड़ों माताओं और बहनों की सेवा के लिए मुझे खुद से अलग करके जाने की इजाजत दी , मेरी माँ को गाली देना बिहार का अपमान है’। प्रधानमंत्री के ऐसा कहने का कारण है बिहार में वोटर अधिकार यात्रा में उनकी माँ के लिए अभद्र टिप्पणी होना। विपक्ष का कहना है कि ये सभी कुछ बिहार चुनाव को ध्यान में रखते हुए किया गया है। पक्ष और विपक्ष के बीच सोशल मीडिया पर आरोप-प्रत्यारोप जारी है।
मीडिया डिबेट में भी अक्सर प्रवक्ताओं को आपस में लड़ते गाली गलौज करते आपने भी देखा होगा । इन डिबेट को परिवार में सबके साथ मिलकर देखना कितना मुश्किल है ये आप जानते ही होंगे । आखिर इसका कारण है क्या कि कभी सदन में तो कभी किसी मंच से गालियां सुनाईं देती हैं । क्या ये कूल बनने के लिए होता है या राजनीति में इतनी कुंठा आ गई है कि गाली दिए बिना बात नहीं बनती।
यादों के झरोखे से
यादों के झरोखे से कई ऐसे क़िस्से सामने आते हैं जो नेताओं की भाषाओं का परिचय देते हैं । भाषा ऐसी कि कान बंद कर लेंगे। जी हाँ कभी ऐसा भी हुआ है कि संसद का भी मान नहीं रखा गया हो, याद कीजिए वो दिन जब दिल्ली भाजपा सांसद रमेश बिधूड़ी ने संसद में भड़वे , उग्रवादी , मुल्ला , कटुए , आतंकवादी जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था, और उनके पीछे बैठे नेता हंस रहे थे।
विवादों में रहे ये नेता
इसी तरह याद आते हैं सांसद अनुराग ठाकुर जिन्होंने सदन में कहा था कि ‘ओबीसी की जनगणना की बात बहुत की जाती है , जिसकी जात का पता नहीं वो गणना की बात करता है’ । इसके साथ ही एक और भाषण याद आता है जब अनुराग ने चुनाव रैली के दौरान रिठाला विधानसभा क्षेत्र में ‘देश के गद्दारों को गोली मारो सालों को’ जैसा नारा लगा दिया था। पूर्व काँग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर का विवादित बयान भी याद आता है,अय्यर ने मोदी को नीच कहा था। नीतीश कुमार ने कुछ ऐसा कह दिया था जिससे कारण वो भी विवादों में रहे । नीतीश कुमार ने जनसंख्या नियंत्रण पर सेक्स को लेकर ऐसी टिप्पणी कर दी थी कि वो विवादों में रहे ।
आज़म खान का विवादित बयान
वहीं आज़म खान का वो विवादित बयान भी याद आता है जिसके कारण वो भी विवादों में रहे। आज़म ने उत्तरप्रदेश के मंच से जय प्रदा के लिए कहा था कि ‘उसकी असलियत समझने में आपको 17 साल लग गए और मैं 17 दिन में पहचान गया कि इनके नीचे का अन्डरवेयर है वो खाकी रंग का है’ । इसके बाद आज़म खान विवादों में रहे थे ।
पीएम मोदी पर भी लगे थे आरोप
इसी तरह पूर्व गुजरात सीएम नरेंद्र मोदी भी इस अभद्रता से बच नहीं पाए उन्होंने भी सोनिया गांधी पर टिप्पणी करते हुए उनको जर्सी गाय बोल दिया था इस कारण वो भी विवादों में रहे। इसके साथ उनके ‘काँग्रेस की विधवा’ जैसे वक्तव्य के कारण भी उनपर आरोप लगे थे । साल दर साल राजनीति में गिरता भाषा का स्तर समाज पर बुरा असर डालता है।
क्या अभद्र टिप्पणी करना है ज़रूरी ?
एक सवाल जो मन में आता है कि ऐसी क्या ज़रूरत है जो ऐसी अभद्र टिप्पणी की जाए। इस तरह कि टिप्पणी किसे फायदा देती है। उत्साह में भरे नेता मंच पर इस तरह के भाषण देते हैं कि विवादों में आ जाते हैं । ऐसा करके कार्यकर्ताओं में उल्लास भरा जा सकता है मगर आपकी छवि खराब भी होती है फिर आप किसी अन्य नेता को कुछ कहने लायक़ नहीं होते। कभी कभी अपने कार्यकर्ताओं में जोश बढ़ाने के लिए इस तरह की टिप्पणी की जाती है, लेकिन इस सब का क्या फायदा जब आप अपनी छवि ही दूषित कर लेंगे तो क्या ही कर सकेंगे। व्यंग्य , शायरी जैसी और भी साहित्यिक विधाएं हैं जिनके ज़रिए अपनी असहमति को जताया जा सकता है। यक़ीनन ये तरीक़ा ज़्यादा बेहतर होगा।
