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March 2, 2026
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शेख़ हसीना: छात्रों के सामने नहीं चली तानाशाही, ऐसा रहा राजनीतिक सफर!

शेख़ हसीना: छात्रों के सामने नहीं चली तानाशाही, ऐसा रहा राजनीतिक सफर!

हाल ही में बांग्लादेश की एक स्थानीय अदालत इंटरनेशनल क्राइम ट्रिब्यूनल ने पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना को फांसी की सज़ा सुनाई है। उनपर 1400 छात्रों की हत्या का आरोप लगा है और बांग्लादेश में उन्हें एक तानाशाह के तौर पर भी देखा जा रहा है। इसके बाद से ही हसीना दुनियाभर में चर्चा का विषय बनी हुई हैं। ऐसे में बांग्लादेश की अभी की स्थिति समझने के लिए सबसे पहले ज़रूरी है कि हम शेख़ हसीना के बांग्लादेश में राजनीतिक सफर को समझें।

शेख़ हसीना की राजनीति में एंट्री

शेख़ हसीना को सत्ता विरासत में मिली थी, उनके पिता शेख़ मुजीबुर्रहमान के जन आंदोलन ने ही बांग्लादेश का निर्माण करवाया, यही वजह है कि उन्हें वहां राष्ट्रपिता का दर्जा मिला। इस तरह 1947 में 28 सितंबर को जन्मी हसीना ने बचपन से ही राजनीतिक उथल-पुथल को देखा और बारीकी से समझा भी।

उन्होंने अपनी पढ़ाई ईडेन महिला कॉलेज से की, उसके बाद ढाका यूनिवर्सिटी से बंगाली साहित्य में मास्टर्स कर अपनी पढ़ाई पूरी की। यहां से उनका राजनीतिक सफर छात्र के रूप में सक्रिय हुआ, क्योंकि हसीना ने अपने पिता की पार्टी आवामी लीग के स्टूडेंट विंग से चुनाव लड़ा और वाइस प्रेजिडेंट के पद पर जीत भी हासिल की। राजनीति की abcd वो यहां से सीख चुकी थीं, बस उसे राष्ट्रीय स्तर अमल में लाना बाकी था। पर किसे पता था कि उनका यह सफर एक बड़े सदमे के बाद शुरू होगा!

शेख़ मुजीबुर्रहमान की हत्या और शेख़ हसीना की भारत में वापसी

1971 में पश्चिमी पाकिस्तान से आज़ाद हुए बांग्लादेश की कमान शेख़ मुजीबुर्रहमान संभाल ही रहे थे, लेकिन महज़ 4 सालों में सेना की उनकी प्रति नाराज़गी भारी पड़ी। ऐसा कहा जाता है कि शेख़ मुजीबुर्रहमान भी तानाशाह के रास्ते पर चल पड़े थे, जिसे देख सेना ने बगावत कर डाली। विद्रोह ऐसा कि अपने ही राष्ट्रपिता की सेना ने उनके घर में घुसकर हत्या कर दी। इस हत्या में उनकी पत्नी, उनके तीन बेटे भी शामिल थे। इस परिवार में अब केवल दो व्यक्ति बचे, जो उस वक्त जर्मनी में थे – शेख़ हसीना और उनकी बहन शेख़ रेहाना।

उस समय भारत में प्रधानमंत्री की कमान संभाल रहीं इंदिरा गांधी ने शेख़ हसीना और उनकी बहन को भारत में शरण दी थी। राजधानी में हसीना ने अपने जीवन के करीब 6 साल बिताए।

1981 शेख़ हसीना की बांग्लादेश वापसी

साल 1981 में शेख़ हसीना अपने वतन लौटीं, और जर्जर पड़ी आवामी लीग में जान डाल दी। 1986 में आम चुनाव हुए जिसमें आवामी लीग को हार का सामना करना पड़ा लेकिन हसीना ने हार नहीं मानी। फिर पांच साल बाद 1991 में स्वतंत्र चुनाव करवाए गए, इसमें भी आवामी लीग को हार का मुंह देखना पड़ा और खालिदा जिया की बांग्लादेश नैशनल पार्टी ने सत्ता संभाली।
1996 में एक बार फिर स्वतंत्र चुनाव करवाए और इस बार शेख़ हसीना की आवामी लीग भारी बहुमत के साथ सत्ता में आई। हालांकि, 2001 के चुनावों में फिर से उनकी हार हुई। अब दौर आया 2009 का जिसे शेख़ हसीना की राजनीति का टर्निंग प्वाइंट माना जाता है, ऐसा इसलिए क्योंकि इसके बाद उन्हें 15 सालों तक सत्ता से कोई हटा नहीं पाया।

शेख़ हसीना की तानाशाह की राह

ऐसा लगता है शेख़ हसीना ने अपने लगभग 30 सालों की राजनीति में तानाशाह बनने का सपना बुन लिया था, जिसे छात्र आंदोलन ने उधेड़ डाला। जब कोई शख़्स कुर्सी को अपनी विरासत, आंदोलन को देशद्रोह, अदालत को हथियार और विपक्ष को प्रतिस्पर्धी के बजाय कट्टर दुश्मन मान बैठे तो समझ लो सत्ता हाथ से जाने वाली है। यह कथन कि सिंहासन खाली करो, जनता आती है… शेख़ हसीना की हालिया स्थिति पर सटीक पर बैठता है।

दलों और बड़े नेताओं पर पाबंदी

शेख़ हसीना ने जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश का खात्मा करने की कोशिश में रहीं। इस संगठन के सभी बड़े नेताओं को फांसी दे दी गई और पार्टी पर पाबंदी तक लगा दी गई। अपनी प्रतिद्वंदी खालिदा जिया पर राजनीतिक प्रतिशोध का आरोप लगाकर जेल में डाल दिया। इसे हम हाल की घटना से समझें तो जैसे ही शेख़ हसीना आंदोलन से भाग कर भारत आईं उसके कुछ घंटों बाद ही खालिदा जिया की रिहाई कर दी गई।

इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल कोर्ट का गठन

वैसे तो बांग्लादेश में मानवता विरोधी गतिविधि करने वालों के लिए उनके पिता शेख़ मुजीबुर्रहमान ने इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल एक्ट का 1973 में गठन किया था पर राजनीतिक अस्थिरता के चलते इसे सालों बाद 2009 में अमल में लाया गया। शेख़ हसीना ने इस एक्ट के तहत इंटरनेशनल ट्रिब्यूनल कोर्ट का गठन किया था, और उनकी ही अदालत ने फांसी की सज़ा सुनाई है।

सरकारी नौकरियों में आरक्षण

हालात तब बिगड़े जब शेख़ हसीना की सरकार ने सरकारी नौकरियों में 30% आरक्षण स्वतंत्रता सेनानियों के वंशजों के लिए तय किया, जबकि उनकी संख्या इतनी नहीं थी। ऐसा कहा जा रहा था कि शेख़ हसीना अपनी पार्टी से जुड़े लोगों और समर्थकों को प्रशासन में बिठाना चाहती थीं, और जनता को उनका यह इरादा समझ आ गया था। इसी वजह से छात्र सड़कों पर उतरे और उन्हें सत्ता से बाहर कर दिया।

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