अगर आप भगवान शिव के भक्त हैं तो आपको मालूम ही होगा कि उत्तराखंड में भगवान शिव को समर्पित पांच केदार है : केदारनाथ, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, मध्य महेश्वर और कल्पेश्वर। यहां जाना मानो एक अलौकिक शक्ति से मिलना। पर क्या आप इसकी कहानी जानते हैं कि कैसे भगवान शिव के ये पांच दिव्य रूप धरती पर प्रकट हुए? अगर नहीं तो चलिए आपको बताते हैं इसकी पौराणिक कहानी।
पंच केदार की पौराणिक कहानी
इन पांच केदारों की पौराणिक कथा की माने तो महाभारत के भीषण और विनाशकारी युद्ध में पांडवों की जीत तो हुई पर एक अपराध बोध भी उनके मन में रहा कि उन्होंने अपने ही भाई बंधुओं को मारा है, फिर चाहे वह धर्म और न्याय की स्थापना के लिए ही सही। यही बोध उन्हें भगवान शिव की भक्ति की ओर ले गया और वे निकल पड़े महादेव की खोज में।
इस खोज में उनका पहला स्थान था काशी, वही नगरी जिसे भगवान शिव का पुराना घर माना जाता है। भोलेनाथ पांडवों से काफी नाखुश थे इसलिए उन्होंने यहां की गई सभी प्रार्थनाओं को अनसुना कर दिया।
अपने दर्शन करवाने से बचने के लिए वे नंदी बैल का रूप धारण कर गढ़वाल की ओर चले गए। रूठे हुए भोलेनाथ जी को मनाने की पांडवों की हठ ने उन्हें शिव के पीछे जाने के लिए मजबूर कर दिया। नंदी बैल बनकर भगवान ने हिमालय की ओर प्रस्थान किया था, इसलिए गुप्तकाशी तक पहुंचकर भीम ने अपना विशाल रूप धारण किया और चारों ओर नज़र डाली। वहां भीम को एक नंदी दिखाई दिए जो घास चर रहे थे। उन्हें उस दिव्य रूप को देखकर लगा कि यह कोई साधारण बैल नहीं बल्कि महादेव का दूसरा भेष है, फिर क्या भीम ने अपने बल का सहारा लेकर बैल की पूंछ और पैरों को पकड़ लिया।
अब भला भगवान को कोई पकड़ सकता है? भीम के इस कृत्य को देख भगवान शिव धरती में विलीन होने लगे। इस तरह उनका शरीर पांच भागों में पंच केदार के रूप में प्रकट हुआ :
- जहां भगवान शिव के कंधे का कुबड़ है वह स्थान केदारनाथ के नाम से जाना जाता है
- उनकी भुजाएँ तुंगनाथ में विराजमान हैं,
- उनके दिव्य मुखमण्डल के दर्शन रुद्रनाथ में होते हैं,
- नाभि और उदर मध्यमहेश्वर में प्रकट हुए,
- और भोलेनाथ के बाल यानी केश कल्पेश्वर में।
इस पौराणिक कथा के अनुसार भगवान शिव को मनाने के लिए पांडवों ने यहां पूजा अर्चना की थी तब जाकर उन्हें अपने अपराध बोध से मुक्त मिली थी।
अपने इस लेख की अगली सीरीज में हम आपको बताएंगे पंच केदारों में सबसे पहले केदार से जुड़ी सारी जानकारी।
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