कल्पेश्वर मंदिर : यहां होती है भोलेनाथ की जटाओं की पूजा, जानें पौराणिक कहानी

kalpeshwar mandir story

12 ज्योतिर्लिंगों के बाद पंच केदारों का सबसे अधिक महत्व है। इससे पहले के लेख में हम एक एक करके 4 केदारों की बात कर चुके है। आज हम बात करेंगे पांचवे और आखिरी केदार कल्पेश्वर मंदिर की, जिसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह साल भर खुला रहता है।

कल्पेश्वर मंदिर

पांचवां केदार कल्पेश्वर उत्तराखंड के ऋषिकेश-बदरीनाथ मार्ग पर हेलंग नामक गांव में स्थित है। यह मंदिर समुद्र तल से 2134 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। इस मंदिर तक प्रवेश के लिए घने जंगलों और पहाड़ियों से होते हुए 10-12 किलोमीटर का ट्रेक पूरा करना होता है। अगर आप भक्ति के साथ साथ साधना में भी विश्वास करते हैं तो यह स्थान आपको दिव्य अनुभूति करवा सकता है। इस जगह को अलकनंदा और कल्पगंगा नदी का संगम भी माना जाता है।

मंदिर के अंदर की बात करें तो प्रांगण में भगवान शिव से जुड़े नंदी, त्रिशूल, डमरू, भस्म, शिवलिंग के साथ-साथ माता पार्वती और भगवान गणेश की भी पूजा की जाती है।

कल्पेश्वर मंदिर की पौराणिक कहानी

पांडवों से जुड़ी पौराणिक कहानी

पांडवों से छिपते छिपाते जब बैल का रूप धारण कर भगवान शिव हिमालय के पहाड़ों में पहुंचे तो भीम ने दिव्य बैल को पहचान लिया। जैसे ही बैल को पकड़ने का प्रयास किया गया, उसके पांच भाग हुए और एक भाग कल्पेश्वर में गिरा। इसके बाद पांडवों ने इन पांच जगहों पर मंदिर का निर्माण करवाया जिसे पंच केदार के नाम से जाना गया। यहां भगवान शिव की जटाओं की पूजा होती है, क्योंकि वही हिस्सा यहां गिरा था।

समुद्र मंथन से जुड़ी कहानी

ऐसी मान्यता है कि इस मंदिर में ही समुद्र मंथन की योजना बनी थी और भगवान शिव ने यहां के कुंड से जल पात्र में समुद्र मंथन के लिए जल दिया था, इससे चौदह रत्नों की प्राप्ति हुई थी।

कल्पेश्वर मंदिर कब खुलता है?

पांच केदारों में बाकी चार केदार साल में 6 महीने बर्फबारी के चलते बंद रहते हैं, पर कल्पेश्वर मंदिर खुला रहता है। यहां श्रद्धालु कभी भी आकर भगवान शिव के दर्शन कर सकते हैं। यह पांच केदारों में सबसे छोटा लेकिन सबसे प्रभावशाली स्थान माना गया है। यहां धार्मिक अनुष्ठान और मंत्रोच्चार भी करवाए जाते हैं।

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