भाषा संचार करने के लिए है,अपने विचार व्यक्त करने के लिए है। एक से दूसरे तक अपनी बात पहुंचाने के लिए है। भाषा चाहे कोई भी हो ये हर स्थान पर एक को दूसरे से जोड़ने का माध्यम है। बिना भाषा के कुछ भी मुमकिन नहीं है। कोई भी जीव हो सभी को ये प्राकृतिक अधिकार है कि वो अपनी भाषा में संचार कर सकता है। अब ज़रा उन पक्षियों के बारे में ही सोचिए जो सुबह होते ही अपनी मधुर आवाज़ से सबकुछ मधुरमय कर देती हैं।
भाषा से प्यार करें थोपें नहीं
लेकिन कितना बुरा होता है जब हम भाषा को प्यार करने के बजाय उसे थोपने लगते हैं। भाषा थोपने के लिए नहीं है वो प्यार करने के लिए कितना कुछ जानने के लिए है। आप किसी भाषा को जानेंगे तो ज़ाहिर है कि उसके साहित्य के बारे में पढ़ेंगे और ऐसा बहुत कुछ जानेंगे जिससे आप अभी तक अनभिज्ञ हैं। इसी तरह अगर किसी भाषा के बारे में नहीं जानते हैं तो इसमें आपका कुसूर नहीं क्योंकि यक़ीनन आप किसी और भाषा के बारे में जानते होंगे। ऐसे में किसी भी तरह भाषा को थोपा नहीं जा सकता है।
ज़बरदस्ती करने से भाषा के विकास में होगी बाधा
जब हम भाषा की बात करते हैं तो तय है कि ये एक व्यक्ति को दूसरे व्यति से जोड़ती है। फिर वो कोई भी भाषा हो लेकिन वो समाज में हर जगह जोड़ने का काम कर रही है ऐसे में हर भाषा का सम्मान बराबर होना चाहिए। ये भाषाओं के विकास के लिए ज़रूरी है कि हम जिस भाषा को जानते हैं उससे अलग भाषा को जानने वाले व्यक्ति से मिलकर कुछ नया सीखते हैं इसमें विरोध की बात का आना किसी भी सूरत में विकास के खिलाफ़ है। यही अगर आप किसी भाषा का सम्मान नहीं करते उसे बोलने वालों से बैर की भावना रखते हैं तो यक़ीनन आप अपनी ही भाषा के विकास में खलल पैदा कर रहे हैं। क्योंकि अगर आप किसी व्यक्ति की भाषा का अपमान कर उसे मजबूर करेंगे कि वो आपकी भाषा में ही बात करे तो ये व्यवहार उसे आपके प्रति घृणा की भावना पैदा करने के लिए मजबूर करेगा और जिस भाषा के प्रति वो प्रेम, सम्मान रख सकता था उसके प्रति भी और घृणा का भाव पैदा होगा। और यहीं से भाषा के विकास में बाधा आती है।
हर भाषा है सम्मानित
हर भाषा का सम्मान ज़रूरी है तभी किसी भाषा का विकास हो सकता है। आप किसी भी भाषा के ज्ञाता हों लेकिन आपको ये अधिकार कभी नहीं है कि आप किसी अन्य व्यक्ति को जिसकी भाषा आपसे भिन्न है उसे अपनी भाषा बोलने के लिए मजबूर करें। आपकी भाषा का सम्मान तभी हो सकता है जब आप अन्य भाषा के प्रति उदार हों। ये उदारता ही प्रेम का भाव पैदा करती है जहां हम भिन्न भिन्न भाषा बोलने पर , भिन्न भिन्न भोजन खाने पर और भिन्न भिन्न संस्कृति का पालन करने पर भी एक हैं क्योंकि हम सभी भिन्न भिन्न मोतियों की तरह हैं जो एक ही धागे में एक साथ हैं। बेशक़ हम अलग अलग भाषा बोलने के कारण अलग हो सकते हैं लेकिन ग़लत नहीं । अलग होना ग़लत नहीं , हर भाषा का सम्मान है ज़रूरी।
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Nice post