आज रामधारी सिंह दिनकर जी का जन्मदिन है। 23 सितंबर 1908 को बिहार के मुंगेर जिले के सिमरिया घाट नामक गाँव में जन्में दिनकर जी की रचनाओं को पाठकों द्वारा बहुत पसंद किया जाता है। उन्होंने इतिहास विषय के साथ बी ए ( ऑनर्स ) की परीक्षा पास की। फिर वो प्रधानाचार्य , सब रजिस्ट्रार , भागलपुर विश्वविद्यालय के कुलपति , भारत सरकार के हिंदी सलाहकार आदि विभिन्न पदों पर रहे।
उनकी यूं तो कई रचनाएं हैं जिन्हें पाठक बहुत पसंद करते हैं लेकिन उनकी रचना ‘रश्मिरथी’ को युवाओं द्वारा ज़्यादा पसंद किया जाता है। ‘रश्मिरथी’ में ऐसा बहुत कुछ है जो यक़ीनन सीखने योग्य है। तो चलिए जानते हैं ‘रश्मिरथी’ काव्य की ऐसी पंक्तियों के बारे में जो 3 बड़ी सीख देती हैं। खासकर मौजूदा हालात में इन पंक्तियों कि हमें सख्त ज़रूरत है।
1) आत्मविश्वास की सीख
‘रश्मिरथी’ की ये पंक्तियाँ मानव को प्रेरित करती हैं कि मानव कुछ भी कर सकता है उसे खुद पर भरोसा होना चाहिए। ये पंक्तियाँ पढ़कर निश्चित ही आप भी साहस महसूस करेंगे।
सच है विपत्ति जब आती है कायर को ही दहलाती है,
सूरमा नहीं विचलित होते क्षण एक नहीं धीरज खोते,
विघ्नों को गले लगाते हैं, काँटों में राह बनाते हैं।
मुख से न कभी उफ़ कहते हैं, संकट का चरण न गहते हैं,
जो आ पड़ता सब सहते हैं, उद्योग निरत नीट रहते हैं,
शूलों का मूल नसाने को , बढ़ खुद विपत्ति पर छाने को।
है कौन विघ्न ऐसा जग में , टिक सके वीर नर के मग में ?
खम ठोंक ठेलता है जब नर ,पर्वत के जाते पाँव उखड़।
मानव जब जोर लगाता है, पत्थर पानी बन जाता है।
गुण बड़े एक से एक प्रखर, हैं छिपे मानवों के भीतर,
मेंहदी में जैसे लाली हो, वर्तिका बीच उजियाली हो ।
बत्ती जो नहीं जलाता है; रोशनी नहीं वह पाता है।
2) त्याग की सीख
ये पंक्तियाँ मनुष्य को त्याग का अर्थ समझाती हैं, इसी तरह दान करना किस तरह सबसे उत्तम कर्म है, इन पंक्तियों द्वारा समझा जा सकता है।
जो नर आत्मदान से अपना जीवन-घट भरता है,
वही मृत्यु के मुख में भी पड़कर न कभी मरता है।
जहां कहीं है ज्योति जगत में, जहां कहीं उजियाला,
वहाँ खड़ा है कोई अंतिम मोल चुकानेवाला।
ईसा ने संसार हेतु सूली पर प्राण गंवा कर,
अंतिम मूल्य दिया गांधी ने तीन गोलियां खाकर।
सुन अंतिम ललकार मोल मांगते हुए जीवन की,
सरमद ने हँसकर उतार दी त्वचा समूचे तन की।
हँसकर लिया मरण ओठों पर , जीवन का व्रत पाला।
अमर हुआ सुकरात जगत में पीकर विष का प्याला।
मरकर भी मनसूर नियति की सह न पाया ठिठोली ,
उत्तर में सौ बार चीख कर बोटी-बोटी बोली।
दान जगत का प्रकृत धर्म है , मनुज व्यर्थ डरता है,
एक रोज़ तो हमें स्वयं सबकुछ देना पड़ता है।
बचते वही,समय पर जो सर्वस्व दान करते हैं,
ऋतु का ज्ञान नहीं जिनको, वे देकर भी मरते हैं।
3) सभ्यता की सीख
ये पंक्तियाँ मानव के अवगुण को बताती हैं, मानव किस तरह सभ्य होने का दावा करता है लेकिन आज भी छल,प्रपंच और कुंठा ने उसे घेर रखा है।
है वृथा वर्ग , उन गुफावासियों से, कुछ बहुत बड़े हैं हम ,
अनगढ़ पत्थर से लड़ो लड़ो किटकिटा नखों से दांतों से ,
या लड़ो ऋक्ष के रोम गुच्छ पूरित,वज्रीकृत हाथों से,
या चढ़ विमान पर नर्म मुट्ठियों से,गोलों की वृष्टि करो,
आ जाए लक्ष्य में जो कोई,निष्ठुर हो सबके प्राण हरो।
ये तो साधन के भेद,किन्तु , भावों में तत्व नया क्या है?
क्या खुली प्रेम की आँख अधिक? भीतर कुछ बढ़ी दया क्या है?
झर गई पूंछ,रोमांत झरे, पशुता का झरना बाक़ी है,
बाहर बाहर तन सँवर चुका,मन अभी सँवरना बाक़ी है।
देवत्व अल्प , पशुता अथोर ,तमतोम प्रचुर परिमित आभा,
द्वापर के मन पर भी प्रसरित, थी यही आज वाली द्वाभा।
बस इसी तरह तब भी ऊपर,उठने को नर अकुलाता था,
पर पद-पद पर वासना जाल में,उलझ उलझ रह जाता था।
औ’ जिस प्रकार हम आज बेल-बूटों के बीच खचित करके,
देते हैं रण को रम्य रूप,विप्लवी उमंगों में भरके।
कहते, अनीतियों के विरुद्ध,जो युद्ध जगत में होता है,
वह नहीं ज़हर का कोष,अमृत का बड़ा सलोना सोता है।