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April 25, 2026
धर्म

वर्ण व्यवस्था : समाज में इससे जुड़े मिथक और वास्तविकता

varna system in India

आधुनिक समाज के तौर-तरीके अलग हैं, यह धर्म, जाति लिंग नस्ल के आधार पर किसी के साथ भेदभाव नहीं करता। वो बात अलग है कि अभी भी समाज में बहुत से लोग ऐसे हैं जो रूढ़िवादी व्यवस्थाओं को गलत तरीके से मानते हैं और भेदभाव करते हैं। वैदिक काल की ऐसी ही एक व्यवस्था है वर्ण की जिसमें काम को केंद्र में रखते हुए विभाजित किया गया था। पर देखते ही देखते कब ये जन्म आधारित हो गई, पता ही नहीं चला! सबसे बुरी बात कि बहुत से लोग आज भी इसे कर्म के आधार पर नहीं जन्म के आधार पर सही मानते हैं। 

वर्ण व्यवस्था (Varna System) 

इसमें निम्नलिखित चार वर्ण है जिन्हें सर्वप्रथम कर्म के आधार पर और बाद में जन्म के आधार पर माना जाने लगा : 

ब्राह्मण (Brahman) 

ब्रह्म का ज्ञान रखने वाला ब्राह्मण है जिसका ज्ञान, गुण ल, आचरण और विचार समाज को सही दिशा में चलने का मार्गदर्शन करते हैं। ब्राह्मण को कई नामों से बुलाया जा सकता है, जैसे – द्विज, द्विजोत्तम, भूसुर। 

ऋग्वेद के पुरुषुक्त में ब्राह्मण को मुख की संज्ञा दी गई है, अर्थात् वेदों का ज्ञान रखने वाला और सत्य के मार्ग पर चलने वाला। 

मुण्डक उपनिषद में कहा गया है कि एक ब्राह्मण वह है जिसने विद्या और अविद्या दोनों को समझकर आत्मज्ञान की प्राप्ति की है। 

वहीं बृहदारण्यक उपनिषद के अनुसार ब्रह्म को जान लेने वाला ही ब्राह्मण कहलाता है। 

छान्दोग्य उपनिषद में कहा गया है कि मन और इंद्रियों पर संयम पर रखने वाला व्यक्ति ब्राह्मण कहलाता है। 

भगवद्गीता में भी भगवान श्री कृष्ण ब्राह्मण के कई गुण बताए हैं जिनके आधार पर एक व्यक्ति को ब्रह्म का स्वरूप माना जा सकता है। इनमें शम (मन की शांति), दम (इंद्रियों का नियंत्रण), तप (तपस्या), शौच (पवित्रता या शुद्धता), क्षमा, श्रद्धा, आत्म साक्षात्कार जैसे गुण शामिल हैं। 

क्षत्रिय (Kshatriya) 

इस वर्ण व्यवस्था में दूसरे स्थान पर क्षत्रिय है यानी समाज का संचालन करने वाला शासक। क्षत्रिय वह जो समाज का रक्षक है, जनता का पालनहार है। 

ऋग्वेद में क्षत्रिय को भुजाओं की संज्ञा की दी गई, इससे अनुमान स्वयं लगाया जा सकता है कि क्षत्रिय रक्षक है। 

जबकि उपनिषद में एक क्षत्रिय केवल योद्धा नहीं बल्कि धर्म का रक्षक है। इसमें कहा गया है कि क्षत्रिय का सर्वोपरि धर्म है राज करते हुए आत्मज्ञान की प्राप्ति करना।  

गीता में एक क्षत्रिय के गुण बताए गए हैं : शौर्य, साहस, दान, तेज, कुशलता, धैर्य और ईश्वरीय भाव। 

वैश्य (Vaishya) 

वैश्य को आसान शब्दों में समझें तो वह व्यक्ति या वर्ण जिसका काम समाज के खाने-पीने और रहने का बंदोबस्त करना है। इस वर्ण में किसान, व्यापारी और पशुपालक लोग आते हैं। मनुस्मृति के अनुसार वैश्य की उत्पत्ति उदर यानी पेट से हुई है। 

जबकि ऋग्वेद में वैश्य को जंघा कहा गया है। गीता में वैश्य के धर्म बताए गए हैं : अन्न, धन और साधन के साथ पशु और प्रकृति की रक्षा करना। 

शूद्र (Shudra) 

यह वर्ण अवांछित कारणों से इतिहास के पन्नों पर चर्चा का विषय रहा। इस वर्ण ने समाज का सबसे बड़ा भार उठाया और सबसे अधिक दुःख भी झेला, सिर्फ इसलिए क्योंकि हमने रूढ़िवादी बातों को गलत तरीके से अपना रखा है। सबसे दुखद बात इसकी जड़ें आज भी इस आधुनिक समाज में मौजूद हैं। 

वर्ण व्यवस्था में शूद्रों का वर्णन किया गया है उन लोगों के लिए जो तीनों वर्णों की सेवा में लगे हैं। इसमें सभी श्रम आधारित काम करने लोगों को शामिल किया जाता है। 

ऋग्वेद में शूद्र का मतलब है पांव, यह वर्ण व्यवस्था का चौथा और निचला हिस्सा है। यही वो आधार है जिसमें सामाजिक ढांचा टिका हुआ है। 

उपनिषद की माने तो शूद्र को आत्मज्ञान से वंचित नहीं किया गया है। छान्दोग्य उपनिषद में सत्यकाम जबाला का ब्रह्मज्ञान के लिए योग्य होना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

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