हाल ही में तालिबान के नए कानून ने सबका ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अफगानिस्तान पर अपनी हुकूमत करने वाले तालिबानी शासकों ने एक ऐसा कानून जारी किया है जिसमें महिलाओं के साथ किसी कैदी जैसे व्यवहार को मंजूरी दी गई है। इसमें महिलाओं के हक़ और सुरक्षा को दरकिनार कर दिया गया है । ये वो सदी है जहां महिलाओं के हक़ और बराबरी की बात की जाती है। ऐसे में किसी देश में महिलाओं के खिलाफ़ कानून का बनना कितना भयावह और पिछड़ापन दर्शाता है। महिलाओं के प्रति शोषण वो विषय है जो हमेशा ही बहस का कारण बना है । अलग अलग देशों में उनकी महिलाओं के हित में कानून ही उसके सम्मान को दर्शाता है । महिलाओं की सुरक्षा को लेकर किसी भी देश में एक महत्वपूर्ण मुद्दा होता ही है। ऐसे युग में जिसमें इंसान ने लगभग बहुत से विषय पर जीत हासिल कर ली है, कितना भयावह है कि वो महिलाओं को उनके अधिकार नहीं दे पा रहा है। तालिबान के इस कानून ने एक बार फिर मनुष्यता को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि असल में वो विकास को कितना समझ पाया है और सभ्यता की परिभाषा असल में है क्या?
क्या है कानून ?
आईए विस्तार से जानते हैं कि असल में ये कानून है क्या ? क्यों ये चर्चा का विषय बना हुआ है। अफगानिस्तान की तालिबानी सरकार के इस क़ानून औरतों पर हाथ उठाने को वैध कर दिया है। इस क़ानून के तहत पति अपनी पत्नी और बच्चों शारीरिक सज़ा दे सकता है। इसमें एक शर्त है वो शर्त ये है कि शारीरिक सज़ा देने से हड्डी न टूटे और कोई खुला घाव न हो। अगर पति के पीटने से महिला की हड्डी टूट जाती है तो उस व्यक्ति को 15 दिन की जेल होगी।
राहत या आफ़त
क़ानून के तहत पति के पीटने से अगर महिला की हड्डी टूट जाती है तो ही उसे 15 दिन की जेल होगी लेकिन ये बात भी पत्नी को अदालत में साबित करनी होगी। ये वो देश है जहां महिला पति की इजाज़त के बगैर किसी से मिल नहीं सकती ऐसे में महिला अपने पति के खिलाफ़ अदालत जाने के लिए रिश्तेदारों की मदद लेगी या फिर अपने पति की ? और खुद के खिलाफ़ शिकायत को पति अदालत में पेश होने देगा ? ये सोचने वाली बात है और इस तरह तालिबान ने 2009 के घरेलू हिंसा से बचाने वाले क़ानून को खत्म कर दिया है।
हर वर्ग की सज़ा है अलग
इस नए क़ानून के तहत औरत को पीटने वाला व्यक्ति किस वर्ग का है ये भी महत्वपूर्ण बात है क्योंकि इसी के आधार पर उसे सज़ा सुनाई जाएगी। जैसे अगर औरत को पीटने वाला व्यक्ति कोई मुल्लाह है धार्मिक गुरु है तो उसे केवल सलाह देकर आज़ाद कर दिया जाएगा। यदि कोई व्यक्ति अभिजात वर्ग का है तो उसे सलाह दी जा सकती है या फिर कोर्ट में पेश होना पड़ सकता है । अगर मध्य वर्ग का व्यक्ति ऐसा करता है तो उसे जेल होगी। नीचे तबके का कोई आदमी ऐसा करता है तो उसे भी जेल होगी।
डू वी हेट अवर विमेन ……
इस कानून के बनने के बाद सालों पहले एक गायक टुपाक का गाना याद आता है। गाने के कुछ बोल ऐसे हैं जो आपको सोचने पर मजबूर कर देते हैं। गाने का नाम है ‘कीप या हेड अप’ , वाय वी रेप अवर विमेन , डू वी हेट अवर विमेन ?…..टुपाक का ये गाना आज भी उतना ही अर्थपूर्ण नज़र आता है जितना उनके दौर में रहा होगा । साल दर साल मनुष्य विकास की सीढ़ी चढ़ता है मगर ये क्या है जो वो बराबरी की बात नहीं कर पाता। इस कानून ने दुनिया भर के महिला अधिकारों की बात करने वाले समूहों को बेचैन किया है। जैसे सालों की बेहतर कोशिश को कोई बर्बाद कर दे ये फैसला ऐसा नज़र आता है। न जाने कितने ही अलग भाषा, अलग देश में रहने वाले कलाकार, महिलाओं के मुद्दों पर आवाज़ उठाते आए हैं लेकिन तो भी समाज में ऐसी सोच पैदा करना कि सब समान हैं कितना मुश्किल नज़र आता है। जब महिलाएं घर के अंदर ही घरेलू हिंसा को सहने पर मजबूर कर दी जाएं तो घर के बाहर क्या ही सुरक्षा है।

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