मदमहेश्वर पंच केदारों में दूसरा केदार है, उत्तराखंड में रुद्रप्रयाग जनपद के ऊखीमठ विकास खंड में स्थित है। इस मंदिर की यात्रा करने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 14 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ती है। कई लोग अपनी यात्रा ऊखीमठ से शुरू करते हैं, यह मंदिर का ट्रेक स्थल माना जाता है। वहीं कई श्रृद्धालु राँसी गांव तक पहुंचकर मंदिर की यात्रा शुरू करते हैं।
मद्महेश्वर की पौराणिक कहानी
पांडव की गोत्र हत्या मुक्ति की कहानी
पांडवों ने गोत्र हत्या के पाप से मुक्ति के लिए भगवान शिव की शरण में जाना सही समझा, इसके लिए पांडव काशी गए पर भगवान शिव वहां से नाराज़ होकर बैल का भेष धारण कर हिमालय की ओर चले गए। पांडवों ने हिम्मत नहीं हारी और वे हिमालय भी गए। वहां भीम ने दिव्य बैल रूपी भगवान शिव को पहचान लिया और उन्हें पकड़ने का प्रयास किया। इसी प्रयास में भगवान शिव के पांच हिस्से हुए, जिनमें से एक हिस्सा मद्महेश्वर में नाभि के रूप में स्थित है। श्रद्धालु यहां भगवान शिव के नाभि के दर्शन करने आते हैं।
शिव-पार्वती की मधुचंद्र रात्रि
एक मान्यता ऐसी भी है कि इस स्थान की सुंदरता से मोहित होकर भगवान शिव और माता पार्वती ने मधुचंद्र रात्रि यही मनाई थी। इसी वजह से यहां ने जल की पवित्रता की बड़ी महिमा है। जल की कुछ बूंदें ही मोक्ष प्राप्ति का मार्ग खोल देती हैं।
कब खुलता है यह मंदिर?
इस मंदिर के कपाट मई महीने में खुलते हैं और भारी बर्फबारी के चलते नवंबर के मध्य तक बंद हो जाते हैं। मंदिर में प्रवेश शुल्क नहीं है पर फोटोग्राफी पर पूरी तरह से प्रतिबंध है।