आज के इस लेख में हम वैदिक संस्कृति में वर्णित चार आश्रमों के बारे में बात करेंगे, जो जीवन के चार अलग चरणों की ओर संकेत करता है। अगर हम ध्यान दें तो इन आश्रमों को बिना माने भी हम ये बदलाव अपने जीवन में देख सकते हैं, इस तरह से चार आश्रम की इस व्यवस्था को अस्वीकार नहीं किया जा सकता। जहां एक तरफ वर्ण सिद्धांत समाज के ढांचे को दर्शाता है, वहीं दूसरी तरफ आश्रम व्यक्तिगत जीवन को सुचारू रूप से चलाने की एक व्यवस्था है। इससे पहले के लेख में हमने चारों वर्णों के बारे में विस्तार से बताया था। अब हम यहां वैदिक सनातन संस्कृति के चार आश्रमों की विस्तार से चर्चा करने वाले हैं।
भारतीय संस्कृति में सामान्य जीवन को 100 वर्षों का मानकर ही इन चार आश्रमों को 25-25 वर्षों में विभाजित किया गया है, आइए एक चार आश्रमों के बारे में विस्तार से जानते हैं :
ब्रह्मचर्य आश्रम (Brahmacharya Ashram)
ब्रह्मचर्य शब्द का प्रयोग सबसे पहले ऋग्वेद में किया गया था :
ब्रह्मचारी चरहत वेददहिर्ः स देवानांभवत्र्येकमङ्गम्।
तेन जार्यामन्वहवन्दद्बृिस्पहतः सोमेन नीतां जुह्वं न देवाः।।
अर्थात् जो ब्रह्मचारी वेदों का अध्ययन करता है या जो वेदों की शक्ति से युक्त है, वह स्वयं ही देवताओं का अंग बन जाता है। यही वो ब्रह्मचर्य है जिसके बल से देव गुरु बृहस्पति ने पापी स्त्री को हराकर और देवताओं ने सोमरस के प्रभाव से उस स्त्री को दंड दिया था।
वहीं अथर्ववेद में ब्रह्मचर्य का उल्लेख मिलता है, इसमें कहा गया है कि एक ब्रह्मचारी मृत्यु तक को मात दे सकता है और ब्रह्मचर्य की शक्ति सम्पूर्ण विश्व के रक्षक के रूप में कार्य कर सकती है।
जीवन के शुरुआती 25 वर्ष ब्रह्मचर्य आश्रम का भाग हैं जिसमें व्यक्ति को अनुशासन और दृढ़ संकल्प से अपने व्यक्तिगत समृद्धि पर ध्यान केंद्रित करना होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो कठोर अनुशासन में रहना ही ब्रह्मचर्य है।
गृहस्थ आश्रम (Grihastha Ashram)
ब्रह्मचर्य आश्रम से शिक्षा ग्रहण कर अगले आश्रम में प्रवेश किया जाता है जिसे गृहस्थ आश्रम कहा गया है। गृहस्थ आश्रम का धर्म है विवाह के बाद अपने कर्तव्यों और कर्मों का पालन कर परिवार और राष्ट्र संभालना। इसके अलावा संतान को जन्म देना गृहस्थ आश्रम का दूसरा महत्वपूर्ण धर्म है। यह आश्रम अन्य तीनों आश्रमों से इसलिए श्रेष्ठ है क्योंकि इसी से सभी का पालन किया जाता है।
पुराणों की माने तो एक गृहस्थ व्यक्ति को धर्म, अर्थ और काम में लगे रहना चाहिए। मनुस्मृति के अनुसार इसमें स्त्री के धर्म की भी बात की गई है। विवाह के बाद पत्नी अपने पति को दो ऋणों से मुक्ति दिलाती है, पहला तो यज्ञ में साथ देकर देव के ऋण से मुक्ति और दूसरा पुत्र को जन्म देकर पितृ ऋण से मुक्ति।
वानप्रस्थ आश्रम (Vanaprastha Ashram)
इसके नाम से ही पता चलता है कि वन की ओर प्रस्थान करना, यह गृहस्थ आश्रम के 25 वर्षों की समाप्ति के बाद का चरण है। मनुस्मृति के अनुसार इसकी शुरुआत तब होती है जब व्यक्ति आई त्वचा ढीली पड़ने लगे, बाल सफेद होने लगे और व्यक्ति के पुत्र को संतान प्राप्ति हो जाए। इस आश्रम में व्यक्ति को अपनी इंद्रियां वश में करके वन की ओर चले जाना चाहिए। इसके बाद ही सन्यास आश्रम का मार्ग तैयार होता है।
सन्यास आश्रम (Sannyasa Ashram)
संसार की विषय-वासनाओं का त्याग कर सत्य, सरलता, अहिंसा और ब्रह्मचर्य का कठोरता से पालन करना चाहिए। दूसरे शब्दों में समझें तो घर, पत्नी, पुत्र, संपत्ति का त्याग कर चले जाना चाहिए। मनुस्मृति में तो यह तक उल्लेख है कि सन्यासी व्यक्ति को एक जगह पर नहीं रुकना चाहिए, ऐसा वह केवल वर्षा के दिनों में कर सकता है। एक सन्यासी का मतलब है अकेला व्यक्ति, जो एकाकी रहकर अपना जीवन निर्वाह करता है, वो भी समस्त मोह-माया त्याग कर। उनके लिए केवल चार क्रियाएं हैं – शौच, ध्यान, भिक्षा और एकांत।
